العروبة والمرض الأمبراطوري …

سمير  صادق :

    الف  شكر  لسايكس  وبيكو  ,  ولو تمكنت   لأقمت  لهم  نصبا  تذكاريا      , لماذا  ؟

أصبح الانسان   في   هذا  العصر ,  وحتى  في  بعض    العصور  القديمة  وفي  بعض  مناطق  العالم, مواطنا   , ولا  وجود  لمواطن  بدون  وطن   ,  ولم   يعرف  السوريون    وطنا لهم   الا   على  يد  سايكس -بيكو   ,   فطوال  ٤٠٠   سنة عثمانية   لم  تكن   هناك  دولة  سورية  , ولم  يكن  هناك  وطنا  سوريا  , وطوال  ١٠٠٠   سنة  عربية  حجازية ,  لم  تكن  هناك  دولة   سورية , ولم  يكن  هناك  وطنا  سوريا  , انما   ولاية  سورية   في   اطار   امبراطورية  اسلامية  عربية , وبعدها  في   اطار  امبراطورية    عثمانية   , ولكن  كان    هناك , ومنذ   آلاف  السنين, منطقة  عشوائية   الحدود  مقارنة   بخرائط  الحدود  في  هذا  العصر ,   اسمها   سوريا  , ولتسمية  المنطقة  باسم  سوريا  , العديد  من  التفسيرات  والشروحات   , التي   لاتهم  الحاضر والمستقبل بكثير   …أسم  المنطقة     الجغرافية   سوريا   , وشعوب  هذه  المنطقة تبعا  لذلك  سوريون   , بغض   النظر  عن  الأصول  العرقية  أو  غيرها     , فمن   عاش  على  الأرض  السورية   هو  سوري   وهويته   سورية …لافرق   ان  كان  فردا  في  قبيلة  او  مواطنا   في  وطن  او  دولة  , انها  الهوية  السورية   الطوعية   , فانتقاء مكان   العيش  طوعا  , يعني   اكتساب  هوية  هذا  المكان   تلقائيا  وحتما , وذلك  بغض  النظر   عن  الشكل    القانوني   لهذه  الأرض   أو  المكان  أو  المنطقة .

لم  تكن    هناك   في   ذلك  الزمن القديم   بشكل  عام  دولا  بالمعنى  العصري   لهذه  المفردة ….  كانت  هناك  مناطق   وكيانات   بشرية    بأعراف   عشائرية  قبلية     أو  أعراف   أخرى  مميزة   ومختلفة  عن   قوانين  ومفاهيم  الدولة   الحديثة   ,  باستثناء   بعض  الحالات    مثل حالة  روما  , التي  كانت  “دولة”  حتى  في  ذلك  الزمن  القديم  …وحتى   انها  تحولت  الى  جمهورية ,  لقد   كانت  دولة  القانون   ,  التي   أخذت  أوروبا   الحديثة عنها    مفهوم ” دولة  القانون” ,  اليونان   القديمة  كانت أيضا   دولة   بمفوم   عصري  ,  شرحه  أرسطو   ومارسته   الهيلينية   بجدارة ,  دولة  أرسطو   هي   الكيان  ,  الذي تم   به تفاعل  الحقوق  والواجبات   بين   المواطن  والوطن ,  كيان  تحول  الى  دولة  , لكونه  منظما  من  قبل  قانون     مشتق  من  ارادة  الشعب   المباشرة   أو  اللامباشرة ,  دولة  تعني   سلطة   وشعب   بعقد  اجتماعي   أي   قانون  ,   ترعاه  الدولة  وتنفذ  بندوه   وتحتكر   العنف الضروري   لتنفيذ   أحكام  القانون  (ماكس  فيبر) .

أتى   الاسلام   وفي  جوفه   عروبة كامنة  مع   الاحتلال  العربي  الحجازي لبلاد    الشام , أو ماسميت  سورية  الكبرى ,ووضع  سكان  بلاد  الشام  تحت    سلطته   , بغض  النظر   عن  أصل  وفصل   هؤلاء   السكان  , انهم  سوريون  نسبة  للأرض  السورية  ….ليسوا  عربا  ,  لأن   الأرض      سوريا  وليست  عرابيا ,وحتى  لو  كان  لهم  أو  لبعضهم او  لكلهم   أصول  عربية ,   الهوية   السورية  انسانية  جغرافية   وليست   عرقية   عنصرية  أو  دينية  عنصرية , أو  عنصرية    ثقافية    أو   عنصرية بشكل   ما ,   لايمكن   للأرض  أن  تكون  عنصرية  ..

 لقد  انتعشت  مفاهيم  ألأصل  والفصل  ,  كتبرير   وتمهيد   لشرعنة   الهيمنة  ,  الادعاء  بأن  الله  عربي  كآدم  وبأن   الهنود  والأسبان  وسكان  دمشق    وأذربيجان     وغيرهم     عربا    ,  ليس  سوى  ممارسة    لعنصرية  مذلة   ,    ليس   في  هذا  العصر  فحسب  ,لقد   كانت  مذلة   في    الزمن  القديم   ايضا  ,     فقبل  ٢٠٠٠  سنة  طبقت روما   المساواة  بين   كل    شعوب   الأمبراطورية  وبين  روما ,  اختراع   الأصل  والفصل كان  ضروريا   لتبرير  وبالتالي   للوصول  الى هيمنة   أصل  على  الأصول  الأخرى    ,  التعامل  مع  الأصول   بهذا  الشكل ,  هو  تعامل   بمادة   العنصرية   ,  التي   لم  يعد  لها  من  وجود   سوى  في  أمخاخ   بعض   المعاقين عقليا   ووجدانيا  من   العرب  ,  انهم  بذلك  يمارسون  المعاوضة  عن  الكسل  والفشل , كسل وفشل   لاعتمادهم  الموروث  على  السيف  وعلى  غنائم  الحروب    , وما  العمل  عندما  يصدأ  السيف  ولم  يعد  بالامكان  استخدامه ؟,هنا   لابد  من   سيف  آخر  , هو   العنصرية , وادعاء  التفوق  العنصري   المؤهل    للهيمنة , التي كان  التعريب  جزءا  منها  وسندا  لها    .

اعود   لتقديم   الشكر     لسايكس-بيكو   ,  لأن  سايكس-بيكو  قدم     لأقل  من  مليونين من  السوريين  , وطنا لائقا   على  الأرض , وبالعديد    من   امكانيات  النجاح ,   فمساحة  الأرض   أكثر  من  كافية , وامكانية  هذه  الأرض  على  الانتاج   أكثر  من  وافية   ,  اضافة  الى  ذلك   قدم  الاعتراف  الدولي  ,  ثم تم  وضع   البلاد  تحت    الانتداب   ,  الذي   أزعجنا  طوله  في  البداية   , والآن   نتحسر  عليه  بسبب  قصره  ,  فخلال   ربع   قرن من  الزمن  ,   تم  في  سوريا   انجاز   أضعاف  أضعاف   ماتم   انجازه  خلال  ١٤  قرنا     ,   لقد  كان   طرد  العثمانيين منقذا لشعوب     الأمبراطورية  العثمانية  ,  حتى   أن  وضع  نهاية  لمفهوم   الخلافة  بشكل   عام  ,كان    بمثابة  عملية  انقاذ للبشرية   لاتقدر  بثمن..

.سايكس  بيكو   لم   يجزئ   الموحد ,  لأن   الموحد   بسيف     سليم    الأول  وسيف   خالد  ابن  الوليد  أو  عمر  ابن  العاص  أو   عقبة  بن  نافع   …  لم  يكن  أصلا  واحد   , وضعت  السياسة   الأمبراطورية    كل  أجزاء هذه  الأمبراطورية   تحت  سلطة  واحدة   هي   سلطة  الأمبراطورية  ,   وحدة  السلطة   الأمبراطورية  لاتعني  وحدة   شعوب  الأمبراطوية  ,  مصر   او  سوريا   أو   المغرب    وغيرهم  , هم  أجزاء   من امبراطورية  واحدة   وليسوا   أجزاء  من  شعب   واحد ,  ولا  تنطبق   عليهم  صفة    شعب – دولة  ,ولا  تنطبق   صفة  الدولة على  الأمبراطورية ,  خاصة   الأمبراطورية الحجازية -العثمانية ,  بعكس  الأمبراطورية  الرومانية   ,  التي كانت   بسبب  عامل  المساواة   وسيادة   القانون   قريبة   جدا  من  الدولة,  في   حين  كانت الأمبراطورية   العربية -العثمانية   بعيدة  جدا  عن  الدولة  ,  وذلك  بسبب   فقدان  عامل    المساواة    بين   شعوب   هذه   الأمبراطورية    وبسبب فقدان   القانون  الوضعي ,  الخلافة  كانت  كيانا   ,دينيا-سياسيا   استمد  شرعيته  من  الشريعة   الاسلامية   ,  لذلك  فان   اعتبار    البلدان   العربية  وحدة     هو  ترجمة   للمفهوم    الأمبراطوري   ,    وحدتهم   كانت  وحدة   احتلالهم واذلالهم وأسلمتهم  وتغيير  لغتهم    , وحدة  في  الشقاء  المشترك  وفي  العبودية  المشتركة  وفي  استغلالهم جميعا  .  انهم  واحد   في  كونهم  جميعا   مستعمرة حجازية   -عثمانية … وحدتهم   في  دفع  الجزية  وفي  ممارسة  الطورقة   ,   وحدتهم   في   تطبيق   مفاهيم  العنصرية   عليهم   وفي  شرعنتة  ,  كما  جاء  في  العهد  العمرية ,  وحدتهم   في  التعرض     لمبدأ  أسلم  تسلم   ومبدأ   الولاء  والبراء ثم  عدم   المساواة كما  جاء   في  مذلة    عهدة  ابن  الخطاب …  ,    انها  وحدة   الساطور  المسلط  على  رقابهم   ..على  رقاب   شعوب   مختلفة  , وضعها    الأمبراطور   أو  الخليفة   تحت   ادارة  واحدة  ,  كانت   ادارته   الواحدة  ,  ومشيئة  واحدة   كانت  مشيئته  …

أصاب   سعادة   بقوله  ان العروبة   ,  التي   احتضنت كل   هذا  الفجور  والوقاحة ,  كانت  مرضا  نفسيا   ,   فالعروبية  كانت   افرازا  أو  ترجمة   للمفهوم  الأمبراطوري   الاحتلالي   الاستيلائي   ,  الذي  هو  المرض  بعينه  … لا  عجب  هنا  من   اصابة  العروبة بنفس  المرض!!

 

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